
उत्तराखंड के खटीमा से दिल्ली तक का सफर, DU और अंबेडकर यूनिवर्सिटी से पढ़ाई के बाद JNU में कर रहीं PhD; 23 दिन की भूख हड़ताल ने दिलाई राष्ट्रीय पहचान, अब SIR और वोट के अधिकार को लेकर CEC के इस्तीफे की मांग
नई दिल्ली। दिल्ली के जंतर-मंतर पर 2 अक्टूबर 2026 से मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चल रहे विरोध-प्रदर्शनों में एक युवा चेहरा लगातार सुर्खियों में है—नेहा बोरा। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा इससे पहले शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा में कथित अनियमितताओं और विद्यार्थियों के अधिकारों को लेकर लंबे आंदोलनों का हिस्सा रह चुकी हैं। 2 अक्टूबर के प्रदर्शन में उन्हें दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया और अगले दिन भी वह जंतर-मंतर की ओर मार्च करने वाले प्रदर्शनकारियों में शामिल रहीं।

कौन हैं नेहा बोरा?
प्राप्त जानकारी के अनुसार नेहा बोरा उत्तराखंड के खटीमा की रहने वाली हैं और उनकी उम्र करीब 29 वर्ष बताई गई है। उनका शैक्षणिक सफर दिल्ली तक पहुंचा। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई की, इसके बाद डॉ. बी.आर. आंबेडकर यूनिवर्सिटी दिल्ली से मास्टर डिग्री हासिल की। वर्तमान में वह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के School of Arts and Aesthetics में Theatre and Performance Studies में PhD शोधार्थी हैं।
उनकी पहचान सिर्फ एक शोधार्थी के रूप में नहीं है। छात्र जीवन के दौरान थिएटर और सामाजिक मुद्दों से जुड़े सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उनकी सक्रियता ने उन्हें सामाजिक और राजनीतिक सवालों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नेहा ने स्वयं एक साक्षात्कार में बताया है कि सामाजिक मुद्दों से उनका जुड़ाव दिल्ली विश्वविद्यालय के समय थिएटर के माध्यम से मजबूत हुआ।

छात्र जीवन में क्या हासिल किया?
नेहा बोरा की सबसे बड़ी उपलब्धि पारंपरिक अर्थों में कोई परीक्षा-रैंक या अकादमिक पुरस्कार नहीं, बल्कि छात्र नेतृत्व और सामाजिक सक्रियता में उनकी भूमिका रही है।
वह AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में देशभर के विद्यार्थियों से जुड़े मुद्दों को उठाती रही हैं। शिक्षा, रोजगार, परीक्षा व्यवस्था, पेपर लीक, छात्रों के अधिकार और उच्च शिक्षा में जवाबदेही उनके प्रमुख मुद्दों में रहे हैं। सितंबर 2026 में भी उन्होंने कहा था कि शिक्षा और रोजगार से जुड़े मुद्दे उठाने वाले छात्रों को देश के नागरिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बनना चाहिए।
उनकी सक्रियता का दायरा JNU तक सीमित नहीं रहा। झारखंड में JPSC-JSSC भर्ती परीक्षाओं से जुड़े छात्र आंदोलन में भी उन्होंने AISA की ओर से भागीदारी की और देश के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे छात्र आंदोलनों को एक-दूसरे से जोड़ने की बात कही।

23 दिन की भूख हड़ताल ने बनाया राष्ट्रीय चेहरा
नेहा बोरा को देशव्यापी पहचान 2026 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुई छात्र आंदोलन की भूख हड़ताल से मिली।
NEET-UG सहित विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के मुद्दे को लेकर हुए आंदोलन में नेहा बोरा ने करीब 23 दिनों तक भूख हड़ताल की। वह शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक तथा AISA से जुड़े अन्य छात्र नेताओं के साथ इस आंदोलन में शामिल थीं। आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगों में तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे, परीक्षा व्यवस्था में सुधार और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने जैसी मांगें शामिल थीं।
लंबे अनशन का उनके स्वास्थ्य पर भी असर पड़ा। रिपोर्टों के मुताबिक 23 दिन के उपवास के दौरान उनका वजन करीब साढ़े सात किलो तक कम हुआ और रक्त शर्करा का स्तर खतरनाक रूप से गिरा था। इसके बावजूद वह आंदोलन से जुड़ी रहीं।
यही वह दौर था जब नेहा बोरा छात्र आंदोलनों के राष्ट्रीय चेहरों में शामिल हो गईं।

पहले आंदोलन का मुद्दा क्या था?
पहले बड़े जंतर-मंतर आंदोलन का केंद्र NEET और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक एवं अनियमितताएं थीं। आंदोलनकारियों का आरोप था कि परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ियों का सबसे ज्यादा नुकसान उन विद्यार्थियों को उठाना पड़ता है जो वर्षों की मेहनत के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होते हैं।
नेहा बोरा ने इस आंदोलन में परीक्षा व्यवस्था में जवाबदेही और सुधार की मांग को प्रमुखता से उठाया। बाद में उन्होंने देश के अलग-अलग छात्र आंदोलनों को एक व्यापक युवा आंदोलन के रूप में देखने की बात भी कही।
अब 2 अक्टूबर से किस मुद्दे पर आंदोलन?
अब नेहा बोरा का आंदोलन शिक्षा से आगे बढ़कर मतदाता अधिकार और चुनावी प्रक्रिया के मुद्दे पर केंद्रित है।
2 अक्टूबर 2026, गांधी जयंती के दिन जंतर-मंतर पर AISA सहित विभिन्न छात्र संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक समूहों के लोगों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे/हटाए जाने की मांग की और मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) में कथित अनियमितताओं तथा बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर सवाल उठाए।
नेहा बोरा इस आंदोलन में प्रमुख भूमिका में नजर आईं। पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर पहुंचने से रोकने और हिरासत में लिए जाने के बावजूद उन्होंने आंदोलन जारी रखने का आह्वान किया। उन्होंने प्रदर्शनकारियों से लोकतंत्र और वोट देने के अधिकार के लिए एकजुट रहने की अपील की।
3 अक्टूबर को भी पीछे नहीं हटीं
2 अक्टूबर की कार्रवाई के बाद भी आंदोलन खत्म नहीं हुआ। 3 अक्टूबर को नेहा बोरा फिर जंतर-मंतर की ओर मार्च में शामिल हुईं। उनके साथ योगेंद्र यादव, कपिल सिब्बल और प्रशांत भूषण सहित अन्य लोग भी प्रदर्शन में शामिल हुए। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकते हुए कई लोगों को हिरासत में लिया।
4 अक्टूबर की रिपोर्टों के अनुसार भी जंतर-मंतर के आसपास प्रदर्शन जारी रहा और नेहा बोरा सहित अन्य नेताओं ने मार्च का नेतृत्व किया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। आंदोलन की प्रमुख मांग अभी भी SIR प्रक्रिया को लेकर आपत्तियां और CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे से जुड़ी हुई है।
नेहा बोरा की राजनीति का मूल मुद्दा क्या है?
नेहा बोरा की सार्वजनिक गतिविधियों को देखें तो उनके आंदोलनों के मुद्दे अलग-अलग दिखाई देते हैं, लेकिन उनमें एक समान सूत्र नजर आता है—युवा, शिक्षा, रोजगार, अधिकार और लोकतांत्रिक जवाबदेही।
पहले वह परीक्षा व्यवस्था और NEET जैसे मुद्दों पर सड़कों पर उतरीं। फिर JPSC-JSSC जैसे भर्ती परीक्षा विवादों में छात्रों के साथ खड़ी हुईं। अब मतदाता सूची और वोट के अधिकार को लेकर जंतर-मंतर पर सक्रिय हैं।
यानी JNU की थिएटर एवं परफॉर्मेंस स्टडीज की शोधार्थी से लेकर AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष और राष्ट्रीय स्तर के छात्र आंदोलनों के प्रमुख चेहरों में शामिल होने तक नेहा बोरा का सफर आंदोलन और छात्र राजनीति के जरिए बना है।








