भोपाल, 1 जुलाई 2026। मध्यप्रदेश के लाखों शासकीय कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत की खबर सामने आई है। वर्ष 2016 से लंबित पड़ी पदोन्नति प्रक्रिया को लेकर अब नया रास्ता खुलता दिखाई दे रहा है। महाधिवक्ता प्रशांत सिंह द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन के विधिक अभिमत के आधार पर राज्य सरकार को यह स्पष्ट किया गया है कि वर्तमान में पदोन्नति प्रक्रिया संचालित करने पर कोई न्यायिक रोक नहीं है।
जारी अभिमत के अनुसार, राज्य सरकार द्वारा पूर्व में उच्च न्यायालय के समक्ष दिया गया मौखिक एवं अनौपचारिक आश्वासन किसी भी न्यायिक आदेश का हिस्सा नहीं है। यह आश्वासन इस अपेक्षा के साथ दिया गया था कि मध्यप्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम, 2025 को चुनौती देने वाली याचिकाओं का शीघ्र निराकरण हो जाएगा, लेकिन परिस्थितियों में परिवर्तन के कारण अब मामले के निस्तारण में और समय लगने की संभावना जताई गई है।
सामान्य प्रशासन विभाग के अपर सचिव अजय कटेसरिया ने सभी विभागों के प्रमुख सचिवों, विभागाध्यक्षों और कलेक्टरों को इस संबंध में आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। अभिमत में यह भी उल्लेख किया गया है कि वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन ने ही उच्च न्यायालय में राज्य सरकार का पक्ष रखा था।
न्यायालय के अंतिम निर्णय के अधीन रहेंगी पदोन्नतियां
विधिक राय में स्पष्ट किया गया है कि पदोन्नति प्रक्रिया शुरू की जा सकती है, लेकिन सभी पदोन्नतियां उच्च न्यायालय अथवा सर्वोच्च न्यायालय के अंतिम निर्णय के अधीन होंगी। यदि भविष्य में न्यायालय का निर्णय भिन्न आता है, तो प्रशासनिक स्तर पर कुछ जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं।
विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक पर नहीं है कोई रोक
अभिमत में विभिन्न न्यायिक निर्णयों का हवाला देते हुए बताया गया है कि केवल किसी मामले के न्यायालय में लंबित होने के आधार पर पदोन्नति प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता। मध्यप्रदेश राज्य बनाम विनय कुमार बाबेल प्रकरण में भी उच्च न्यायालय ने माना था कि नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं के लंबित रहने मात्र से सरकार विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की बैठक आयोजित करने और पदोन्नति देने से वंचित नहीं होती।
केवल 40 प्रतिशत क्षमता पर कार्य कर रहा है प्रशासनिक तंत्र
राज्य सरकार ने न्यायालय में यह भी बताया था कि वर्तमान में कई विभाग अपनी स्वीकृत क्षमता के लगभग 40 प्रतिशत अमले के साथ कार्य कर रहे हैं। पिछले लगभग दस वर्षों से पदोन्नति नहीं होने के कारण बड़ी संख्या में उच्च पद रिक्त पड़े हुए हैं, जिससे प्रशासनिक कार्य प्रभावित हो रहे हैं। इसके साथ ही पदोन्नति न होने से निचले पदों पर भर्ती प्रक्रिया भी प्रभावित हुई है।
सरकार का मानना है कि नई पीठ के गठन और अंतिम निर्णय आने तक पदोन्नति प्रक्रिया को पूरी तरह रोकना न तो प्रशासनिक दृष्टि से व्यावहारिक है और न ही जनहित में उचित माना जा सकता है। ऐसे में राज्य सरकार अब न्यायालय के अंतिम फैसले के अधीन रहते हुए पदोन्नति प्रक्रिया आगे बढ़ाने की तैयारी में है।








