नौवीं अनुसूची में शामिल करने की संभावना पर विचार की मांग, हाईकोर्ट के फैसले के बाद तेज हुई कानूनी और राजनीतिक कवायद
भोपाल। मध्यप्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को 27 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने की मांग को लेकर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने राज्यपाल और मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है। उन्होंने राज्य शासन से अनुरोध किया है कि आरक्षण संबंधी प्रावधानों को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल कराने की संभावनाओं पर विचार किया जाए और इस दिशा में केंद्र सरकार के स्तर पर आवश्यक पहल की जाए।
सिंघार ने सोशल मीडिया पर साझा की गई पोस्ट में कहा कि ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने के लिए संवैधानिक एवं विधिक प्रावधानों के अनुरूप कदम उठाए जाने चाहिए। उनका प्रस्ताव ऐसे समय आया है, जब मध्यप्रदेश में आरक्षण को लेकर कानूनी विवाद फिर तेज हो गया है।

हाईकोर्ट ने 27 प्रतिशत आरक्षण का कानून किया निरस्त
मध्यप्रदेश में वर्ष 1994 के आरक्षण कानून के तहत ओबीसी वर्ग को सरकारी सेवाओं में 14 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा था। वर्ष 2019 में तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने इसे बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का प्रावधान किया था। इस फैसले को अदालत में चुनौती दी गई थी।
9 अक्टूबर 2026 को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 27 प्रतिशत आरक्षण बढ़ाने वाले कानून को असंवैधानिक ठहराते हुए 14 प्रतिशत आरक्षण बहाल कर दिया। अदालत ने कहा कि कुल आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा से अधिक जाने के लिए आवश्यक असाधारण परिस्थितियां पर्याप्त रूप से साबित नहीं की गईं। साथ ही, लंबित 13 प्रतिशत पदों पर तीन महीने के भीतर अनारक्षित श्रेणी के तहत भर्ती प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए।

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
हाईकोर्ट के फैसले के बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी ओबीसी महासभा के प्रतिनिधिमंडलों से मुलाकात कर इस विषय पर चर्चा की है। इस तरह 27 प्रतिशत आरक्षण का मुद्दा अब न्यायिक प्रक्रिया के साथ-साथ राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण बना हुआ है।
क्या नौवीं अनुसूची में शामिल होने से रास्ता निकलेगा?
संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल कानूनों को अनुच्छेद 31बी के तहत कुछ संवैधानिक संरक्षण मिलता है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि उसमें शामिल हर कानून न्यायिक समीक्षा से पूरी तरह बाहर हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट के आई.आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य (2007) के फैसले के अनुसार, 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में शामिल कानून भी यदि संविधान के मूल ढांचे को नुकसान पहुंचाते हैं, तो उनकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
ऐसे में ओबीसी आरक्षण संबंधी प्रावधानों को नौवीं अनुसूची में शामिल कराने का प्रस्ताव कानूनी और संवैधानिक परीक्षण के अधीन रहेगा। इसके लिए संबंधित कानून में आवश्यक संशोधन और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत केंद्र तथा संसद के स्तर पर पहल की जरूरत पड़ सकती है।
फिलहाल, उमंग सिंघार के पत्र पर राज्य सरकार और राजभवन की ओर से किसी निर्णय की जानकारी सामने नहीं आई है। अब देखना होगा कि 27 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने के लिए सरकार न्यायालय में चल रही कानूनी लड़ाई के साथ नौवीं अनुसूची संबंधी प्रस्ताव पर क्या कदम उठाती है।








