जेल में 20 साल की सजा काट रहा डेरा प्रमुख बार-बार बाहर, पैरोल-फर्लो व्यवस्था पर सवाल

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बलात्कार के दोषी राम रहीम को फिर 21 दिन की फर्लो, 6 साल में 17वीं अस्थायी रिहाई; उठे कई सवाल

चंडीगढ़। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह एक बार फिर जेल से बाहर है। हरियाणा सरकार ने उसे 21 दिन की फर्लो दी है। रोहतक की सुनारिया जेल से बाहर आने के साथ ही राम रहीम की 2020 के बाद यह 17वीं अस्थायी रिहाई बताई जा रही है। खास बात यह है कि वह इसी वर्ष मई में 30 दिन की पैरोल पूरी कर 26 जून को जेल लौटा था और करीब दो महीने बाद फिर उसे अस्थायी रिहाई मिल गई।

दो साध्वियों से दुष्कर्म के मामले में 20 साल की सजा

गुरमीत राम रहीम को 2017 में सीबीआई की विशेष अदालत ने दो महिला अनुयायियों से बलात्कार के मामले में दोषी ठहराया था और 20 वर्ष की सजा सुनाई थी। वह इसी सजा के तहत जेल में है।

इसके अलावा पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड में उसे पहले उम्रकैद की सजा मिली थी, हालांकि मार्च 2026 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने उसे इस मामले में बरी कर दिया। अब इस बरी किए जाने के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुका है और शीर्ष अदालत ने चुनौती पर विचार करने की सहमति दी है।

17 बार जेल से बाहर, बढ़ती रिहाइयों ने खड़े किए सवाल

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक 2020 से अब तक राम रहीम को कई बार पैरोल और फर्लो मिल चुकी है। अगस्त 2026 की 21 दिन की फर्लो को मिलाकर उसकी अस्थायी रिहाइयों की संख्या 17 बताई जा रही है। मई 2026 में उसे 30 दिन की पैरोल मिली थी, जिसे उसकी 16वीं अस्थायी रिहाई बताया गया था।

बार-बार मिलने वाली इन अस्थायी रिहाइयों ने जेल प्रशासन, सरकार और पैरोल व्यवस्था को लेकर राजनीतिक तथा सामाजिक बहस को फिर तेज कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि गंभीर अपराध में लंबी सजा काट रहे कैदी को इतनी बार अस्थायी राहत मिलने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है।

पैरोल और फर्लो में अंतर भी समझना जरूरी

कानून के तहत पैरोल और फर्लो जेल से स्थायी रिहाई नहीं हैं, बल्कि निर्धारित परिस्थितियों और नियमों के तहत कैदी को सीमित अवधि के लिए जेल से बाहर आने की अनुमति होती है। फर्लो आम तौर पर कैदी के अच्छे आचरण और सुधारात्मक व्यवस्था से जुड़ी होती है, जबकि पैरोल विशेष परिस्थितियों में दी जाती है।

लेकिन राम रहीम के मामले में लगातार होने वाली अस्थायी रिहाइयों की संख्या ने इस व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। इकोनॉमिक टाइम्स की हालिया संपादकीय टिप्पणी के मुताबिक उसकी पिछली अस्थायी रिहाइयों में जेल से बाहर बिताया समय 435 दिनों तक पहुंच चुका था, मौजूदा फर्लो को छोड़कर।

विरोध के सुर भी तेज

राम रहीम को बार-बार पैरोल/फर्लो दिए जाने पर सिख संगठनों और कई नेताओं की ओर से पहले भी आपत्ति जताई जाती रही है। हालिया रिहाई के बाद अकाल तख्त और एसजीपीसी से जुड़े नेताओं ने भी सवाल उठाते हुए कहा कि अलग-अलग कैदियों के लिए अस्थायी रिहाई के नियमों के इस्तेमाल में समानता होनी चाहिए।

जनता के बीच बड़ा सवाल—क्या गंभीर अपराधों में भी बार-बार अस्थायी राहत उचित?

राम रहीम की लगातार अस्थायी रिहाइयों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या कानून में उपलब्ध पैरोल और फर्लो का इस्तेमाल गंभीर अपराधों में दोषी ठहराए गए कैदियों के लिए भी इतनी बार किया जाना चाहिए?

एक तरफ सरकार और जेल प्रशासन के पास कानून के तहत रिहाई देने का अधिकार है, वहीं दूसरी तरफ पीड़ितों के अधिकार, न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास और समानता के सिद्धांत को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

राम रहीम की ताजा 21 दिन की फर्लो ने एक बार फिर इस बहस को राष्ट्रीय स्तर पर ला दिया है कि पैरोल और फर्लो की व्यवस्था के लिए अधिक स्पष्ट, पारदर्शी और समान मानदंड तय किए जाने चाहिए या नहीं।

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