सूखे नशे पर ऑपरेशन प्रहार, गीले नशे पर मेहरबान सरकार! नशामुक्ति अभियान पर उठ रहे सवाल

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गांजा-चरस और ड्रग्स के खिलाफ लगातार कार्रवाई, लेकिन शराब की बिक्री से सरकार को मिल रहा राजस्व; क्या नशामुक्ति की लड़ाई में शराब को भी शामिल नहीं किया जाना चाहिए?

धार। प्रदेश और देश को नशामुक्त बनाने तथा युवा पीढ़ी को नशे की गिरफ्त से बचाने के लिए पुलिस द्वारा ऑपरेशन प्रहार के तहत गांजा, चरस और अन्य मादक पदार्थों के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही है। खेतों में गांजे की अवैध खेती से लेकर नशे के कारोबार में शामिल लोगों की धरपकड़ तक पुलिस अभियान चला रही है। लेकिन इसी बीच समाज में एक बड़ा सवाल भी उठने लगा है कि जब नशा युवा पीढ़ी और समाज को बर्बाद कर रहा है तो फिर नशे के सभी रूपों के खिलाफ एक समान अभियान क्यों नहीं चलाया जा रहा?

एक तरफ पुलिस सूखे नशे के खिलाफ अभियान चलाकर गांजे के पौधे और अन्य मादक पदार्थ जब्त कर रही है, वहीं दूसरी तरफ शराब, बीयर और वाइन की बिक्री कानूनी आबकारी व्यवस्था के तहत जारी है। गांवों से लेकर शहरों तक शराब की दुकानें संचालित हो रही हैं। ऐसे में आम लोगों के बीच यह चर्चा है कि क्या केवल गांजा और ड्रग्स ही नशे की समस्या हैं या शराब भी उतनी ही गंभीर सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी चुनौती है?

सरकारी खजाने में शराब से हजारों करोड़ का राजस्व

मध्यप्रदेश में शराब की बिक्री से सरकार को बड़ा आबकारी राजस्व प्राप्त होता है। PRS की मध्यप्रदेश बजट विश्लेषण रिपोर्ट 2026-27 के अनुसार, राज्य सरकार ने वर्ष 2026-27 में आबकारी से 20,279 करोड़ रुपये राजस्व प्राप्त होने का अनुमान रखा है। यह आंकड़ा बताता है कि शराब से मिलने वाला राजस्व राज्य की आय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

यही वजह है कि नशामुक्ति की सरकारी मुहिम और शराब की व्यवस्थित बिक्री के बीच विरोधाभास को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि सरकार ने वर्ष 2025-26 में प्रदेश के कुछ नगरीय और ग्रामीण क्षेत्रों में शराब दुकानें बंद करने की नीति भी लागू की थी, लेकिन पूरे प्रदेश में शराब की बिक्री पर प्रतिबंध नहीं है।

शराब भी स्वास्थ्य और परिवार के लिए गंभीर खतरा

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार शराब एक नशीला और निर्भरता पैदा करने वाला पदार्थ है। इसके सेवन से लिवर, हृदय रोग, कैंसर और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ता है। इसके अलावा सड़क दुर्घटनाओं, घरेलू हिंसा और पारिवारिक आर्थिक परेशानियों से भी इसका संबंध सामने आया है

ऐसे में सवाल यह है कि जब सरकार और प्रशासन युवा पीढ़ी को नशे से बचाने का संकल्प ले रहे हैं तो शराब के दुष्परिणामों को रोकने के लिए भी उतनी ही गंभीरता से अभियान क्यों नहीं चलाया जाता?

नशामुक्ति अभियान में सभी प्रकार के नशे पर समान ध्यान जरूरी

समाज के जागरूक लोगों का मानना है कि नशे के खिलाफ कार्रवाई किसी एक पदार्थ तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। अवैध गांजा, चरस, ड्रग्स के कारोबार पर कठोर कार्रवाई के साथ शराब के अवैध कारोबार, नाबालिगों को शराब की बिक्री, सार्वजनिक स्थानों पर नशाखोरी और शराब पीकर वाहन चलाने वालों के खिलाफ भी सख्ती जरूरी है।

नशामुक्त प्रदेश का सपना तभी सार्थक होगा, जब अभियान का उद्देश्य केवल अवैध नशे की धरपकड़ नहीं, बल्कि हर प्रकार के नशे से होने वाले सामाजिक नुकसान को कम करना होगा।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि सरकार का उद्देश्य युवा पीढ़ी को नशे से बचाना और अपराधों पर नियंत्रण करना है तो फिर सूखे और गीले नशे के बीच यह अंतर क्यों? क्या नशामुक्ति अभियान में शराब को भी समान गंभीरता से शामिल करने का समय नहीं आ गया है?

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