मनावर (धार)। शासकीय एकीकृत कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय मनावर के संकुल प्राचार्य द्वारा सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारी के बदले एक बेहद ही गैर-जिम्मेदाराना जवाब देने का मामला सामने आया है। हैरान करने वाली बात यह है कि कार्यालय से जारी किए गए इस आधिकारिक पत्र में न तो पत्र क्रमांक (क्र./स्था./2026/) दर्ज है और न ही जारी करने की दिनांक लिखी गई है। बिना तारीख और नंबर के शासकीय पत्र जारी करना विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
अतिथि शिक्षकों की मांगी थी जानकारी
मिली जानकारी के अनुसार, मनावर निवासी शहनवाज शेख ने सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत संकुल केन्द्र मनावर के अधीनस्थ रिक्त पदों, उनके विरुद्ध रखे गए अतिथि शिक्षकों की प्रमाणित जानकारी, नामों की सूची और उन्हें रखने वाले प्राधिकारी के संबंध में जानकारी मांगी थी। इसके साथ ही वर्ष 2024-25, 2025-26 और 2026-27 के अतिथि शिक्षकों का ब्यौरा भी चाहा था।
नियमों का हवाला देकर पल्ला झाड़ा
सवालों के जवाब देने के बजाय प्राचार्य शासकीय एकीकृत कन्या उ.मा.वि. मनावर ने यह कहते हुए जानकारी देने से साफ मना कर दिया कि “सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत एक से अधिक बिंदुओं एवं एक से अधिक सत्रों की जानकारी देना संभव नहीं है।
”लापरवाही की हद: बिना नंबर-तारीख का ‘शासकीय पत्र’
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा विसंगति यह है कि कार्यालय प्रमुख (प्राचार्य) के हस्ताक्षर और सील वाले इस पत्र के शीर्ष पर ‘क्रमांक’ और ‘दिनांक’ के स्थान को खाली छोड़ दिया गया है। जानकारों का कहना है कि किसी भी सरकारी कार्यालय से बिना डिस्पैच नंबर (पत्र क्रमांक) और तारीख के जवाब जारी होना प्रशासनिक लापरवाही का बड़ा उदाहरण है। ऐसे में यह पत्र रिकॉर्ड में दर्ज भी है या नहीं, इस पर संशय बना हुआ है। अब देखना यह है कि इस प्रकार की लापरवाही और आरटीआई आवेदनों को टालने की प्रवृत्ति पर वरिष्ठ अधिकारी क्या संज्ञान लेते हैं।
अधूरे पत्र के खिलाफ प्रथम अपील दायर करेंगे श्री शेख
इस भ्रामक और नियम विरुद्ध जवाब से असंतुष्ट होकर आरटीआई आवेदक शहनवाज शेख ने अब आरपार की लड़ाई का मन बना लिया है। श्री शेख ने बताया कि इस पत्र के विरुद्ध उच्च अधिकारियों के समक्ष प्रथम अपील दायर की जाएगी। इस अपील के माध्यम से वे वरिष्ठ अधिकारियों को इस बात से अवगत कराएंगे कि बिना पत्र क्रमांक और दिनांक के शासकीय पत्र जारी करना प्रशासनिक नियमों का खुला उल्लंघन है। इसके साथ ही, जनहित से जुड़ी मांगी गई जानकारी के संबंध में ‘संभव नहीं है’ जैसा टालमटोल भरा जवाब देना कानूनन कहां तक उचित है?









