मध्य प्रदेश में वर्तमान में 1.84 लाख टीबी मरीज हैं, जबकि राजस्थान में यह संख्या 1.65 लाख है। हर साल करीब डेढ़ लाख मरीजों का इलाज डॉट्स थेरेपी के माध्यम से किया जाता है। बिगड़ी मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट टीबी (एमडीआर-टीबी) के इलाज के लिए केंद्र सरकार ने सितंबर 2024 में चार नई दवाओं को मंजूरी दी थी। हालांकि, प्रदेश में इन दवाओं का फार्मूला तो उपलब्ध है, लेकिन केवल तीन दवाएं ही यहां मिल पा रही हैं। इससे इलाज में देरी हो सकती है।
गांधी मेडिकल कॉलेज से जुड़े श्वसन रोग संस्थान के अधीक्षक रतन कुमार वैश्य के अनुसार, टीबी का इलाज संभव है, लेकिन इसके लिए मरीज को दवाओं का पूरा कोर्स करना होता है। यदि कोई मरीज बीच-बीच में दवाएं छोड़ देता है, तो टीबी के जीवाणु उन दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं, जिससे सामान्य उपचार बेअसर हो जाता है और टीबी बिगड़ने का खतरा बढ़ जाता है।
बिगड़ी टीबी के इलाज के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बेडाक्विलाइन, प्रीटोमैनिड, लाइनज़ोलिड और मोक्सीफ्लोक्सासिन (बीपीएएलएम) नामक दवाओं के संयोजन को मंजूरी दी थी। इन दवाओं का कोर्स मरीज की स्थिति के अनुसार छह से नौ महीने तक चल सकता है। हालांकि, प्रीटोमैनिड दवा अभी मध्य प्रदेश में उपलब्ध नहीं है, जिससे मरीजों को और इंतजार करना पड़ रहा है। इस बीच, राज्य क्षय रोग प्रशिक्षण केंद्र टीबी विशेषज्ञों को इन दवाओं के उपयोग के लिए प्रशिक्षण दे रहा है।
