बेंगलुरु जल संकट: कभी झीलों का शहर, आज बूंद-बूंद पानी को मोहताज

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बेंगलुरु, जो कभी अपनी झीलों और तालाबों के लिए प्रसिद्ध था, अब भीषण जल संकट से जूझ रहा है। फरवरी के खत्म होने से पहले ही शहर में सूखे के हालात बन चुके हैं। गर्मियों में स्थिति और गंभीर होने की आशंका है। हालात पर काबू पाने के लिए बेंगलुरु जल आपूर्ति और सीवरेज बोर्ड (BWSSB) ने गैरजरूरी पानी के इस्तेमाल पर रोक लगाई है और उल्लंघन पर 5000 रुपये का जुर्माना तय किया है। साथ ही, पानी बर्बाद करने वालों की शिकायत के लिए एक हेल्पलाइन नंबर भी जारी किया गया है।

पानी संकट की मौजूदा स्थिति

BWSSB के अध्यक्ष राम प्रसाद मनोहर के अनुसार, साउथ-ईस्ट बेंगलुरु, वाइटफील्ड और बाहरी इलाकों में सबसे ज्यादा जल संकट होने की संभावना है। ये इलाके मुख्यतः भूमिगत जल पर निर्भर हैं। बोर्ड ने लोगों से भूजल की बजाय कावेरी कनेक्शन के पानी का इस्तेमाल करने की अपील की है। स्पेशल टास्क फोर्स की रिपोर्ट के अनुसार, शहर में हर दिन 800 मिलियन लीटर पानी निकाला जा रहा है, जिससे भूजल स्तर तेजी से गिरता जा रहा है।

इतिहास में झांकें तो…

बेंगलुरु प्राकृतिक रूप से झीलों का इलाका नहीं था। 16वीं सदी में विजयनगर साम्राज्य के नादप्रभु केंपेगौड़ा ने जल संरक्षण के लिए सैकड़ों झीलें बनवाईं। इन झीलों का नेटवर्क इतना संगठित था कि एक झील भरने पर पानी स्वतः दूसरी झीलों में चला जाता था। 20वीं सदी के मध्य तक शहर में 262 झीलें थीं, जो अब घटकर 20 से भी कम रह गई हैं। शहरीकरण के चलते कई झीलों पर अपार्टमेंट, आईटी पार्क और सड़कें बन गईं। कोरमंगला झील की जगह आज स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स है, जबकि संपांगी झील की जगह कांतीरवा स्टेडियम बन चुका है।

कम बारिश और भूजल संकट

बेंगलुरु समुद्र तल से ऊंचाई पर स्थित है, जिससे मॉनसून कमजोर पड़ता है। यहां की पथरीली जमीन पानी को सोख नहीं पाती, जिससे थोड़ी सी बारिश भी तेजी से बह जाती है। बढ़ती आबादी के कारण भूजल पर निर्भरता बढ़ गई है। कई इलाकों में लोग 1500 फीट गहरे बोरवेल खोद रहे हैं, फिर भी पानी नहीं मिल पा रहा। कावेरी नदी से पानी लाना महंगा और सीमित है, जिससे समस्या और गहराती जा रही है।

डे-जीरो के करीब?

डे-जीरो का मतलब है जब किसी शहर में पीने योग्य पानी पूरी तरह खत्म हो जाए। साल 2018 में दक्षिण अफ्रीका का केपटाउन ऐसा पहला शहर था जो डे-जीरो के करीब पहुंचा था। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बेंगलुरु में जल संरक्षण के उपाय नहीं किए गए तो स्थिति केपटाउन जैसी हो सकती है।

क्या बेंगलुरु रेगिस्तान बन सकता है?

वैज्ञानिकों के मुताबिक, जब किसी इलाके में सालभर में 25 सेमी से कम बारिश होती है तो वह रेगिस्तान बनने लगता है। बेंगलुरु में बारिश की कमी और पेड़ों की कटाई इस दिशा में इशारा कर रही है। इतिहास में सहारा और अराल सागर जैसे हरे-भरे इलाकों के मरुस्थल में बदलने के उदाहरण भी इस खतरे को बढ़ाते हैं।

समाधान की ओर कदम

जल संकट से निपटने के लिए लोगों को जागरूक होना होगा। वर्षा जल संचयन, झीलों का पुनरुद्धार, ग्रीन कवर बढ़ाना और पानी के विवेकपूर्ण उपयोग जैसे उपाय समय की जरूरत हैं। यदि अब भी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाला समय और भी भयावह हो सकता है।

Pooja upadhyay
Author: Pooja upadhyay

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